नई दिल्ली।
राजनीतिक रूप से सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश समेत देश के 5 राज्यों में फरवरी-मार्च में होने वाले चुनाव पर सभी की निगाहें हैं। खासतौर पर यूपी पर कि पिता-पुत्र की विवाद के बीच कौन सरकार बनाएगा। लेकिन इस चुनाव में जीत के साथ ही एक और बात है जो नरेंद्र मोदी या बीजेपी के लिए भी जरूरी है। वह है राष्ट्रपति चुनाव। अगर बीजेपी उत्तर प्रदेश और पंजाब जीतने में नाकाम रही तो उसे अपनी पसंद के बजाए दूसरे दलों के लिए भी मान्य शख्स की ओर जाना पड़ेगा।
ऐसा है राष्ट्रपति चुने जाने का गणित
मौजूदा हालात में एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं। अपने कैंडिडेट को सीधे चुनाव जिताने के लिए उसे करीब एक लाख और वोटों की जरूरत है। जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां 1,03,756 वोट दांव पर हैं। इसमें सबसे ज्यादा यूपी में 83,824 वोट हैं।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि बीजेपी के यूपी और पंजाब चुनाव हारने की स्थिति में भी मोदी सरकार राष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार जिताने में कामयाब हो जाएगी। बस फर्क यह आ जाएगा कि फिर अपनी पसंद के बजाए सर्वस्वीकार्य कैंडिडेट की ओर जाना होगा। यानी कि ऐसा शख्स जो सभी दलों को मान्य हो।
जुलाई में राष्ट्रपति चुनावजुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्रसमिति जैसी पार्टियों का रुख अहम होगा। एनालिस्ट और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक अभय कुमार दुबे के मुताबिक, 'पांचों राज्यों के चुनाव मोदी सरकार के लिए कई मायनों और कारणों से खास हैं। एक बड़ा कारण राष्ट्रपति चुनाव भी है।'
'अगर राष्ट्रपति पद के कैंडिडेट को जिताने के लिए जरूरी संख्या नहीं होगी तो फिर अन्य क्षेत्रीय दलों से बात करनी होगी। ऐसे में अन्य दलों का एनडीए के उम्मीदवार पर सहमत होना जरूरी है। इस स्थिति में एनडीए को अपने कैंडिडेट का चयन सोच-समझकर से करना होगा।'
राष्ट्रपति चुनाव में चुने हुए सांसद-विधायक लेते हैं हिस्सा
राष्ट्रपति पद का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत किया जाता है। इसमें लोकसभा, राज्यसभा के चुने हुए सांसद और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक हिस्सा लेते हैं। विधायकों के वोट का मूल्य 1971 की आबादी के आधार पर एक निश्चित अनुपात में तय किया जाता है। सभी राज्यों और दिल्ली-पुड्डुचेरी विधानसभाओं के कुल मतों के बराबर लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 238 मेंबर्स के वोटों का मूल्य होता है।
फिलहाल एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं, जिसमें से अकेले बीजेपी के पास करीब 3.68 लाख वोट हैं। वहीं, यूपीए के पास 2.30 लाख वोट हैं जिसमें से कांग्रेस के पास 1.5 लाख वोट हैं।
ऐसा है राष्ट्रपति चुने जाने का गणित
मौजूदा हालात में एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं। अपने कैंडिडेट को सीधे चुनाव जिताने के लिए उसे करीब एक लाख और वोटों की जरूरत है। जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां 1,03,756 वोट दांव पर हैं। इसमें सबसे ज्यादा यूपी में 83,824 वोट हैं।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि बीजेपी के यूपी और पंजाब चुनाव हारने की स्थिति में भी मोदी सरकार राष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार जिताने में कामयाब हो जाएगी। बस फर्क यह आ जाएगा कि फिर अपनी पसंद के बजाए सर्वस्वीकार्य कैंडिडेट की ओर जाना होगा। यानी कि ऐसा शख्स जो सभी दलों को मान्य हो।
जुलाई में राष्ट्रपति चुनावजुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्रसमिति जैसी पार्टियों का रुख अहम होगा। एनालिस्ट और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक अभय कुमार दुबे के मुताबिक, 'पांचों राज्यों के चुनाव मोदी सरकार के लिए कई मायनों और कारणों से खास हैं। एक बड़ा कारण राष्ट्रपति चुनाव भी है।'
'अगर राष्ट्रपति पद के कैंडिडेट को जिताने के लिए जरूरी संख्या नहीं होगी तो फिर अन्य क्षेत्रीय दलों से बात करनी होगी। ऐसे में अन्य दलों का एनडीए के उम्मीदवार पर सहमत होना जरूरी है। इस स्थिति में एनडीए को अपने कैंडिडेट का चयन सोच-समझकर से करना होगा।'
राष्ट्रपति चुनाव में चुने हुए सांसद-विधायक लेते हैं हिस्सा
राष्ट्रपति पद का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत किया जाता है। इसमें लोकसभा, राज्यसभा के चुने हुए सांसद और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक हिस्सा लेते हैं। विधायकों के वोट का मूल्य 1971 की आबादी के आधार पर एक निश्चित अनुपात में तय किया जाता है। सभी राज्यों और दिल्ली-पुड्डुचेरी विधानसभाओं के कुल मतों के बराबर लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 238 मेंबर्स के वोटों का मूल्य होता है।
फिलहाल एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं, जिसमें से अकेले बीजेपी के पास करीब 3.68 लाख वोट हैं। वहीं, यूपीए के पास 2.30 लाख वोट हैं जिसमें से कांग्रेस के पास 1.5 लाख वोट हैं।