औरंगाबाद। देश के संविधान ने हर नागरिक को अपने अपने पर्सनल ला पर अमल करने का अधिकार दिया है और संविधान से प्रिय कोई नहीं है।
यह बात जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने औरंगाबाद में राष्ट्रीय एकता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही।
जमीअत उलेमा ए हिन्द की ओर से आयोजित सम्मेलन में अन्य धर्मों के धार्मिक नेताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए और आपसी एकता के संदेश को सार्वजनिक करने पर जोर दिया। अधिवेशन में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से एक संकल्प भी पारित किया गया जिसमें सांप्रदायिक ताकतों के बढ़ते महत्वाकांक्षा पर सरकार की चुप्पी की निंदा की गई और देश के सभी निवासियों से आपसी सहिष्णुता रहने की अपील की गई।
सदाए भारत की रिपोर्ट के अनुसार अधिवेशन में हिंदू-सिख-ईसाई और दलित धार्मिक नेताओं ने भी संबोधित किया और आपसी एकता को सफलता की कुंजी बताते हुए एक दूसरे के साथ खड़े रहनेकी अपील की।
इस मौके पर मौलाना सैयद अरशद ने जमीयत के लगातार संघर्ष की तारीख से नई पीढ़ी को अवगत कराया। साथ ही साथ मौलाना ने मौजूदा दौर में सांप्रदायिकता की प्रवृत्ति वृद्धि के लिए प्रधानमंत्री की चुप्पी पर कटाक्ष भी किया।
मौलाना मदनी ने कहा कि घर वापसी, लव-जिहाद और मताधिकार को छीनने की बात की जा रही थी, लेकिन प्रधानमंत्री तीन साल तक बिल्कुल चुप रहे।
और जब बोले तो तीन तलाक की आड़ में मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकार लाने की बात कही। जमीयत प्रमुख ने अपने भाषण में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रभेद की प्रशंसा भी की।
मौलाना ने कहा कि देश में अल्पसंख्यकों और दलितों को अगर ऐसे ही निशाना बनाया जाता रहा तो यह देश फिर विभाजन के कगार पर पहुंच सकता है। मौलाना ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल ला में संपादन होना है, तो इसके लिए मुसलमानों की राय ली जाए न कि पूरे देश की।
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