
लखनऊ। नोटबंदी के फैसले के चलते बैंकों और एटीएम के बाहर बुधवार को भी लोगों की लंबी लाइन लगी हुई है। इलाहाबाद में बैंकों के बाहर लगी लाइन में कई बुजुर्ग और बीमार महिलाएं भी हैं।
जब मीडिया ने शहर में एसबीआई की खुल्दाबाद ब्रांच का जायजा लिया तो यहां नब्बे बरस की एक ऐसी बुजुर्ग महिला लाइन में लगी नजर आईं, जो अपने पैरों पर ठीक से खड़ी भी नहीं हो सकती थीं। इसके अलावा यहीं एक ऐसी मुस्लिम महिला घर से लाए हुए स्टूल पर लाइन में बैठी नजर आई, जिसके पैरों में चोट है और वह भी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती थी।
इलाहाबाद में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की खुल्दाबाद ब्रांच के बाहर खाते से पैसा निकालने आई 90 साल की ज़ाहिदा बेगम अपने पैरों पर खड़ी भी नहीं हो सकतीं। एक बेटा इलाहाबाद से बाहर है जबकि दूसरा बीमार पड़ा है, लिहाजा ज़ाहिदा बेगम को खुद यहां आकर लाइन में लगना पड़ा। उम्र के आखिरी दौर में पहुंच चुकीं ज़ाहिदा अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकतीं, लिहाजा वह लाइन में बैठ गईं और रेंगते-रेंगते आगे बढ़ रही थीं।
सरकार ने बुजुर्गों व महिलाओं के लिए अलग लाइन बनाने की बात कही है, लेकिन इलाहाबाद में एसबीआई की इस ब्रांच में ऐसे कोई इंतजाम नहीं थे। लाइन में बैठी ज़ाहिदा को ठंड के इस मौसम में भी पसीने आ रहे थे। उनका कहना था कि वह काफी बीमार भी रहती हैं, लिहाजा काफी मजबूरी में यहां धक्के खाने को आई हैं।
मीडिया की टीम ने इस बारे में बैंक के लोगों से बात की तो थोड़ी ना नुकर के बाद कैमरे के डर की वजह से उन्होंने ज़ाहिदा को अंदर आने की एंट्री दे दी। हालांकि, बैंक का कोई भी अफसर इस बारे में कैमरे के सामने कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुआ। बैंक वालों ने ज़ाहिदा को भी कुछ देर बाद पीछे के गेट से निकाल दिया। इससे यह भी पता नहीं चल सका कि उन्हें पैसे मिले या नहीं मिले।
स्टेट बैंक की इस ब्रांच में ज़ाहिदा अकेली परेशान नहीं थी। इसी ब्रांच में लाइन में लगी शम्मू नाम की मुस्लिम महिला घर से लाए स्टूल पर बैठकर लाइन में लगी थी। शम्मू को भी पैर में भी चोट लगी है और वह भी खड़ी नहीं हो सकती हैं। उन्हें लंबी लाइन का अंदाज़ा भी था, लिहाजा वह घर से स्टूल साथ लेकर आई थीं।
शम्मू को अखबारों और टीवी चैनलों की ख़बरों से भीड़ का अंदाज़ा था, लिहाजा वह स्टूल और पानी साथ लेकर आई थीं। शम्मू करीब ढाई घंटे तक स्टूल पर बैठे हुए आगे सरकती रही। हालांकि उन्हें बाद में कामयाबी मिल ही गई। शम्मू के पति व बेटा दोनों ही नौकरी में हैं और सुबह ही घर से निकल जाते हैं, लिहाजा उन्हें मजबूरी में ब्रांच में आना पड़ा। ज़ाहिदा और शम्मू जैसे तमाम ऐसे भी मजबूर व परेशान लोग हैं जो इसी तरह लंबी लाइनों में खड़े होकर धक्के खाने को मजबूर हैं।